जलपाईगुड़ी के डेंगुआझार चाय बागान में बुधवार रात से गुरुवार सुबह तक करम पूजा की पारंपरिक धूम देखी गई। आदिवासी समाज के इस अनोखे पर्व में जहां प्रकृति की आराधना होती है, वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी इस उत्सव में पूरे परिवार के साथ शामिल होकर आदिवासियों के साथ नृत्य करते नजर आए। बुधवार रात करम वृक्ष की डाली काटकर उसे केला के पौधे से घिरे वेदी पर स्थापित किया गया और रातभर धामसा-मादल की ताल पर पूजा, नृत्य और गीत का आयोजन हुआ।
गुरुवार सुबह उस डाली को नदी में विसर्जित कर पूजा का समापन हुआ। महेश राउतिया, जो पूजा समिति के सदस्य हैं, ने बताया कि आदिवासी समाज करम वृक्ष को देवता के रूप में पूजता है। उनके अनुसार, “पुराने समय में जब आदिवासी जंगलों में रहते थे, तब वे करम पेड़ के नीचे जीवनयापन करते थे। उसी परंपरा को सैकड़ों वर्षों से निभाया जा रहा है।”
अब चूंकि जंगल और पेड़ कम हो गए हैं, इसलिए जो कुछ करम वृक्ष बचे हैं, उनकी डाली लाकर पूजा की जाती है। इस विशेष अवसर पर सदर एसडीओ तमजित चक्रवर्ती, सदर बीडीओ मिहिर कर्मकार, सहित कई प्रशासनिक और सामाजिक हस्तियों ने सपरिवार आदिवासी नृत्य में भाग लिया और सामुदायिक सौहार्द्र का संदेश दिया।
